सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को सड़क सुरक्षा पर अमल से जुड़े मामलों की सुनवाई के दौरान कहा कि भारत में प्रभावी रूप से लेन ड्राइविंग की कोई अवधारणा नहीं है। सड़क हादसों की बड़ी वजह यही है। कोर्ट ने कहा है कि पब्लिक गाड़ियों को फिटनेस सर्टिफिकेट तब तक जारी न हो जब तक कि उसमें इमरजेंसी पैनिक बटन न लगा हो और ट्रैकिंग डिवाइस न हो। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच एस. राजशेखरन बनाम केंद्र सरकार मामले की सुनवाई कर रही थी.
जिसमें अदालत समय-समय पर सड़क सुरक्षा को लेकर निर्देश जारी करती रही है।

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को यात्री सुरक्षा को लेकर बड़ा निर्देश जारी करते हुए कहा कि किसी भी पब्लिक सर्विस गाड़ी को तब तक फिटनेस सर्टिफिकेट या परमिट नहीं दिया जाएगा
जब तक उसमें वीकल लोकेशन ट्रैकिंग डिवाइस (VLTD) और गाड़ी पोर्टल ‘वाहन’ डेटाबेस में दर्ज न हों। यह व्यवस्था आपात स्थिति में क्विक रिएक्शन सुनिश्चित करने और खासकर महिलाओं, बच्चों तथा बुजुर्गों की सुरक्षा बढ़ाने में अहम है। सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान जस्टिस पारदीवाला ने कहा कि देश में यह सुनिश्चित करना कठिन है कि ड्राइवर लेन अनुशासन का पालन करें, जबकि लेन ड्राइविंग से दुर्घटनाओं में काफी कमी लाई जा सकती है।
केंद्र से इस पहलू पर गंभीरता से ध्यान देने को कहा.

गाड़ियों में वीकल लोकेशन ट्रैकिंग डिवाइस (VLTD) और इमरजेंसी बटन के मुद्दे पर कोर्ट ने एमिकस क्यूरी की दलीलों पर गौर किया। अदालत को बताया गया कि केंद्रीय मोटर वाहन नियम, 1989 के नियम 125H के तहत सार्वजनिक सेवा वाहनों में ट्रैकिंग डिवाइस और पैनिक बटन लगाना अनिवार्य है। कोर्ट ने चिंता जताई कि फिलहाल 1% से भी कम गाड़ियों में ये डिवाइस है। अदालत ने सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशो को नियम 125H का सख्ती से पालन कराने का निर्देश दिया। 21 दिसंबर 2018 तक रजिस्टर्ड गाड़ियों में भी इन उपकरणों की रेट्रोफिटिंग करने का निर्देश दिया।
सोर्स : इंडिया टीवी



