सोलर रेडिएशन के खतरे, फ्लाइट्स में 0-1 का फेर और उस एक हादसे का सबक

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FOURTHPILLARSNEWSUPTAE 29.11.2025

6,000 विमानों के चक्‍काजाम की इनसाइड स्‍टोरी इस बार का मामला मुख्यतः इलेक्ट्रॉनिक डेटा करप्‍शन यानी डेटा करप्‍ट होने से जुड़ा है. समस्या उस समय सामने आई, जब एयरबस ने बताया कि सोलर विकिरण से फ्लाइट कंट्रोल से जुड़े कंप्यूटर मेमोरी में ‘बिट फ्लिप’ (bit-flip) हो सकता है. पूरा मामला समझ लीजिए.

एयरबस (Airbus) के अलर्ट के बाद सुरक्षा कारणों से भारत में करीब 400 विमान प्रभावित हैं. इसके पीछे सोलर रेडिएशन (Solar Radiation) बड़ी वजह बताई जा रही है.

सोलर रेडिएशन को दरअसल सूर्य द्वारा उत्‍सर्जित होने वाले कणों जैसे इलेक्‍ट्रॉन, प्रोटॉन वगैरह और सूर्य की अल्‍ट्रावायलेट किरणों का एक मिश्रण कहा जा सकता है.

दुनियाभर में 6,000 विमानों पर इसका असर हुआ है. सोलर रेडिएशन के चलते फ्लाइट कंट्रोल डेटा प्रभावित होने की आशंका के बाद DGCA ने प्रभावित विमानों के EAC यानी एलेवेटर ऐलेरॉन कंप्यूटर को बदने का आदेश जारी किया है. बताया जा रहा है कि अपडेशन जारी है और 30 नवंबर की सुबह तक सिस्‍टम दुरुस्‍त कर लिया जाएगा. सोलर रेडिएशन होता क्‍या है, ये कितना खतरनाक है, ये विमानों के पायलट्स को कैसे प्रभावित करता है और फ्लाइट्स पर इसका कैसा असर पड़ता है… इन तमाम बातों को हम यहां समझने की कोशिश करेंगे.

क्‍या होता है सोलर रेडिएशन….?


सोलर रेडिएशन को दरअसल सूर्य द्वारा उत्‍सर्जित होने वाले कणों जैसे इलेक्‍ट्रॉन, प्रोटॉन वगैरह और सूर्य की अल्‍ट्रावायलेट किरणों का एक मिश्रण कहा जा सकता है.

ये विद्युत चुंबकीय तरंगें होती हैं, जो विमानों(फ्लाइट्स) के इलेक्‍ट्रॉनिक सिस्‍टम के लिए खतरा बन सकती है. जब सोलर रेडिएशन यानी सौर विकिरण तेज होता है, जैसे कि सौर तूफानों के दौरान या सोलर फ्लेयर्स के दौरान तो फ्लाइट बहुत ऊंचाई में रहने के दौरान इस रेडिएशन की चपेट में आ जाते हैं. काफी ऊंचाई पर वायुमंडल की अलग संरचना होती है, जिसके चलते रेडिएशन और विमान के बीच कोई बाधा या अवरोध नहीं होता है और ये रेडिएशन, सीधे विमानों के उपकरणों तक पहुंच सकता है. एयरबस ने ऐसे ही खतरे को लेकर 28 नवंबर, शुक्रवार को अलर्ट जारी किया.

पायलट और फ्लाइट पर कैसा असर

इस बार का मामला मुख्यतः इलेक्ट्रॉनिक डेटा करप्‍शन यानी डेटा करप्‍ट होने या नष्‍ट होने (Data Corruption) से जुड़ा है. हालांकि इसके स्‍वास्‍थ्‍य संबंधी जोखिम भी होते हैं. बार-बार ज्‍यादा ऊंचाई पर उड़ान भरने वाले पायलट, क्रू मेंबर्स ज्‍यादा सोलर और कॉस्मिक रेडिएशन का सामना करते हैं. इसका असर यात्रियों पर भी पड़ सकता है. लंबे समय तक इस तरह के एक्सपोजर से कैंसर, मोतियाबिंद और अन्य रेडिएशन-जनित रोगों का खतरा बढ़ सकता है. हालांकि इसके लिए जरूरी सावधानियां बरती जाती हैं.

0 और 1 का फेर समझ लीजिए

समस्या उस समय सामने आई, जब एयरबस ने बताया कि सोलर विकिरण से फ्लाइट कंट्रोल से जुड़े कंप्यूटर मेमोरी में ‘बिट फ्लिप’ (bit-flip) हो सकता है. इस ऐसे समझिए कि फ्लाइट के कंप्यूटर की मेमोरी में डेटा बायनरी फॉर्मेट में स्‍टोर होता है. यानी जो भी डेटा इनपुट होता है, उसे कंप्‍यूटर 0 और 1 के रूप में एक्‍सेस और प्रोसेस करता है. सरल शब्‍दों में कंप्‍यूटर और सॉफ्टवेयर को 0 और 1 की भाषा ही समझ आती है.

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