fourth pillars news update 12.10.2026
रायपुर। पर्यावरण संरक्षण की चर्चा करना आसान है, लेकिन वास्तविक सफलता तभी मिलेगी, जब हम अपनी बातों को व्यवहार में उतारेंगे और धरातल पर ठोस प्रयास करेंगे। केवल बड़े-बड़े संकल्प लेने या पर्यावरण संरक्षण की बातें करने से बदलाव नहीं आएगा, बल्कि पानी बचाने, बिजली की खपत कम करने, प्लास्टिक का उपयोग कम करने और प्रकृति के प्रति जिम्मेदार व्यवहार अपनाने जैसी छोटी-छोटी आदतों से ही व्यापक परिवर्तन की नींव रखी जा सकती है। यह विचार शासकीय जे. योगानंदम छत्तीसगढ़ महाविद्यालय, रायपुर के रसायन शास्त्र विभागाध्यक्ष डॉ. गोवर्धन व्यास ने राष्ट्रीय सेवा योजना के स्वयंसेवकों के लिए आयोजित विशेष व्याख्यान में व्यक्त किए।
डॉ. व्यास ने स्वयंसेवकों को पर्यावरण संरक्षण के लिए कुछ सरल लेकिन प्रभावी उपाय अपनाने की प्रेरणा दी।

शासकीय छत्तीसगढ़ महाविद्यालय में एनएसएस स्वयंसेवकों के लिए विशेष व्याख्यानः दैनिक जीवन में बदलाव और व्यावहारिक प्रयासों पर दिया जोर
’’पर्यावरण संरक्षण एवं हमारी भूमिका’’ विषय पर आयोजित व्याख्यान में डॉ. व्यास ने पर्यावरण के महत्व, वर्तमान समय में उसके समक्ष उत्पन्न खतरों, उनके दुष्प्रभावों और संरक्षण के उपायों पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि पर्यावरण संरक्षण आज की आवश्यकता है, लेकिन इसके लिए केवल जागरूकता व्यक्त करना पर्याप्त नहीं है। जब तक जागरूकता हमारे व्यवहार, आदतों और रोजमर्रा के निर्णयों में दिखाई नहीं देगी, तब तक अपेक्षित परिणाम प्राप्त करना कठिन होगा।
छोटी-छोटी आदतों से आएगा बड़ा बदलाव

उन्होंने कहा कि पॉलीथिन की जगह कपड़े के थैलों का उपयोग करें, हाथ धोते समय नल को अनावश्यक रूप से खुला न छोड़ें, डिस्पोजेबल कप के बजाय अपना गिलास साथ रखें, किसी कमरे से बाहर निकलते समय लाइट और पंखे बंद करें तथा कम दूरी के लिए वाहन का उपयोग करने के बजाय पैदल चलने की आदत विकसित करें।
उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे स्वयं बदलाव की शुरुआत करें और दूसरों को भी अपने उदाहरण से प्रेरित करें।

उन्होंने कहा कि ये आदतें सामान्य लग सकती हैं, लेकिन यदि प्रत्येक व्यक्ति इन्हें नियमित रूप से अपनाए, तो इनका सामूहिक प्रभाव बहुत बड़ा हो सकता है। पर्यावरण संरक्षण का वास्तविक अर्थ केवल पौधारोपण करना या विशेष अवसरों पर जागरूकता कार्यक्रम आयोजित करना नहीं है, बल्कि पूरे वर्ष प्रकृति के प्रति जिम्मेदार बने रहना है।
डॉ. व्यास ने यह भी कहा कि पर्यावरणीय समस्याओं का समाधान तभी संभव है, जब समाज का प्रत्येक व्यक्ति अपनी भूमिका को गंभीरता से समझे।
सरकार, संस्थाओं और सामाजिक संगठनों के प्रयासों के साथ नागरिकों की सक्रिय भागीदारी भी आवश्यक है। बड़े बदलाव की शुरुआत अक्सर छोटे कदमों से होती है और निरंतर किए गए प्रयास ही स्थायी सफलता का आधार बनते हैं। महाविद्यालय की प्राचार्य अंजलि भटनागर ने अपने उद्बोधन में पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाने और विद्यार्थियों को प्रकृति के प्रति संवेदनशील बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि युवाओं की सक्रिय भागीदारी से समाज में सकारात्मक बदलाव लाया जा सकता है।
पर्यावरण संरक्षण के प्रति जिम्मेदारी का भाव विकसित करना और उसे दैनिक जीवन में अपनाना समय की मांग है।
राष्ट्रीय सेवा योजना की कार्यक्रम अधिकारी डॉ. निशा शर्मा ने कहा कि एनएसएस स्वयंसेवक समाज में सकारात्मक बदलाव लाने और पर्यावरण संरक्षण का संदेश जन-जन तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। ऐसे कार्यक्रम विद्यार्थियों में सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना विकसित करने के साथ उन्हें प्रकृति के प्रति अपने कर्तव्यों का बोध भी कराते हैं। श्री मोहन प्रताप सिंह ने भी पर्यावरण संरक्षण को दैनिक जीवन का हिस्सा बनाने तथा प्राकृतिक संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग पर बल दिया।
उन्होंने कहा कि पर्यावरण की सुरक्षा के लिए व्यक्तिगत प्रयासों के साथ सामूहिक सहभागिता भी जरूरी है।
व्याख्यान के दौरान विद्यार्थियों ने पर्यावरण संरक्षण से संबंधित विभिन्न प्रश्न पूछे। डॉ. गोवर्धन व्यास ने विद्यार्थियों की जिज्ञासाओं का उत्तर देते हुए विभिन्न व्यावहारिक उदाहरणों के माध्यम से पर्यावरणीय समस्याओं, उनके प्रभावों और समाधान के उपायों को समझाया। प्रश्नोत्तर सत्र ने विद्यार्थियों को पर्यावरण संरक्षण के विषय को दैनिक जीवन से जोड़कर समझने का अवसर प्रदान किया।
कार्यक्रम के अंत में कार्यक्रम अधिकारी डॉ. निशा शर्मा ने आभार व्यक्त करते हुए आमंत्रित वक्ता डॉ. गोवर्धन व्यास के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया।
उन्होंने कार्यक्रम में सहभागिता करने वाले सभी विद्यार्थियों एवं उपस्थितजनों का भी आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम का मुख्य संदेश यही रहा कि पर्यावरण संरक्षण केवल भाषणों, नारों और संकल्पों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। वास्तविक सफलता तब मिलेगी, जब हमारी कही हुई बातें हमारे कार्यों में दिखाई देंगी। यदि हम बड़ी उपलब्धियों की अपेक्षा करते हैं, तो हमें अपने स्तर पर छोटे-छोटे प्रयासों की शुरुआत करनी होगी। बदलाव की शुरुआत दूसरों से अपेक्षा करने के बजाय स्वयं से करें।




