रायपुर के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) के पीआरओ ने उनके निधन की पुष्टि की है. तीजन बाई पिछले कई हफ्तों से रायपुर AIIMS में भर्ती थीं और गंभीर रूप से बीमार चल रही थीं. आज तड़के करीब 3:15 बजे अचानक उनकी तबीयत और बिगड़ी, जिसके बाद उन्होंने अंतिम सांस ली. उनके निधन की खबर से छत्तीसगढ़ समेत पूरे देश के सांस्कृतिक और कला जगत में शोक की लहर दौड़ गई है.
लोक संस्कृति और कला के क्षेत्र में उनके अभूतपूर्व योगदान के लिए तीजन बाई को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों से विभूषित किया था जिनमें पद्म श्री (1987/88), पद्म भूषण (2003), पद्म विभूषण (2019), संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार शामिल है.

छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के गनियारी गांव में 1956 में जन्मी तीजन बाई का जीवन संघर्ष और दृढ़ संकल्प की एक अद्वितीय मिसाल रहा है. उन्होंने लोक कला ‘पंडवानी’ (महाभारत की पारंपरिक कथा गायन शैली) को न केवल सहेजा, बल्कि उसे एक नया आयाम दिया.
तीजन बाई ने उस दौर में पंडवानी की ‘कापालिक शैली’ को अपनाया, जिस पर पारंपरिक रूप से पुरुषों का वर्चस्व हुआ करता था. शुरुआत में उन्हें भारी सामाजिक विरोध और बंधनों का सामना करना पड़ा. लेकिन अपनी दमदार आवाज, कड़क अभिनय, बेजोड़ अभिनय कला और हाथ में तंबूरा लिए जब वे मंच पर उतरती थीं, तो श्रोता मंत्रमुग्ध हो जाते थे.
पांच दशकों से अधिक के अपने शानदार करियर में उन्होंने देश ही नहीं, बल्कि एशिया और यूरोप सहित दुनिया के कई कोनों में छत्तीसगढ़ की माटी की इस कला का परचम लहराया. अपने शुरुआती सालों में सामाजिक रुकावटों और विरोध के बावजूद, उन्होंने पंडवानी को बचाए रखा और पॉपुलर बनाया. उन्होंने कलाकारों की कई पीढ़ियों को प्रेरित किया और भारत की सबसे खास लोक परंपराओं में से एक को दुनिया भर में पहचान दिलाने में मदद की.
पद्म विभूषण पंडवानी गायिका तीजन बाई का निधन, रायपुर AIIMS में ली अंतिम सांस
छत्तीसगढ़ की लोक कला और पंडवानी गायन को वैश्विक पहचान दिलाने वाली पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई का निधन हो गया है. वे बीते कुछ समय से बीमार चल रही थीं और शनिवार तड़के उन्होंने रायपुर एम्स में अंतिम सांस ली.
रायपुर के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) के पीआरओ ने उनके निधन की पुष्टि की है.
तीजन बाई पिछले कई हफ्तों से रायपुर AIIMS में भर्ती थीं और गंभीर रूप से बीमार चल रही थीं. आज तड़के करीब 3:15 बजे अचानक उनकी तबीयत और बिगड़ी, जिसके बाद उन्होंने अंतिम सांस ली. उनके निधन की खबर से छत्तीसगढ़ समेत पूरे देश के सांस्कृतिक और कला जगत में शोक की लहर दौड़ गई है.
छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के गनियारी गांव में 1956 में जन्मी तीजन बाई का जीवन संघर्ष और दृढ़ संकल्प की एक अद्वितीय मिसाल रहा है. उन्होंने लोक कला ‘पंडवानी’ (महाभारत की पारंपरिक कथा गायन शैली) को न केवल सहेजा, बल्कि उसे एक नया आयाम दिया.
तीजन बाई ने उस दौर में पंडवानी की ‘कापालिक शैली’ को अपनाया, जिस पर पारंपरिक रूप से पुरुषों का वर्चस्व हुआ करता था. शुरुआत में उन्हें भारी सामाजिक विरोध और बंधनों का सामना करना पड़ा. लेकिन अपनी दमदार आवाज, कड़क अभिनय, बेजोड़ अभिनय कला और हाथ में तंबूरा लिए जब वे मंच पर उतरती थीं, तो श्रोता मंत्रमुग्ध हो जाते थे.
पांच दशकों से अधिक के अपने शानदार करियर में उन्होंने देश ही नहीं, बल्कि एशिया और यूरोप सहित दुनिया के कई कोनों में छत्तीसगढ़ की माटी की इस कला का परचम लहराया. अपने शुरुआती सालों में सामाजिक रुकावटों और विरोध के बावजूद, उन्होंने पंडवानी को बचाए रखा और पॉपुलर बनाया. उन्होंने कलाकारों की कई पीढ़ियों को प्रेरित किया और भारत की सबसे खास लोक परंपराओं में से एक को दुनिया भर में पहचान दिलाने में मदद की.
लोक संस्कृति और कला के क्षेत्र में उनके अभूतपूर्व योगदान के लिए तीजन बाई को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों से विभूषित किया
गया था जिनमें पद्म श्री (1987/88), पद्म भूषण (2003), पद्म विभूषण (2019), संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार शामिल है.




