आशा भोसले का निजी जीवन तब काफी दर्द से गुजर रहा था. उन्होंने खुद बताया, “उस समय, मेरी शादी हो चुकी थी और मैं अपने परिवार से अलग रह रही थी. मुझे अपने भाई बाल (हृदयनाथ मंगेशकर) की इतनी ज्यादा याद आ रही थी कि मैं रो पड़ी. फिर एक ही टेक में गाना गा दिया गुलजार ने भी ‘मोरा गोरा अंग लइ ले’ इस फिल्म में बतौर गीतकार डेब्यू किया था. संगीत दिया था एसडी बर्मन यानी सचिन देव बर्मन ने. एक गाना था जिसे उन्होंने ‘आसा’ (आशा भोसले को इसी नाम से पुकारते थे सचिन दा) को गाने के लिए सौंपा. माइक्रोफोन पर गाने आईं तो टेक्निकली बिल्कुल ठीक थीं. गाना भी रौ में था, लेकिन वो बात नहीं थी जिसकी अपेक्षा सचिन देव बर्मन कर रहे थे. फिर क्या, दादा नाराज हो गए और बोले, “आसा, क्या ‘बाल’ तुम्हारा भाई नहीं है….? क्या तुम उसे राखी नहीं बांधती………..?
1963 में बिमल रॉय की ‘बंदिनी’ रिलीज हुई. नूतन, धर्मेंद्र और अशोक कुमार ने मुख्य भूमिकाएं निभाई थीं.

आशा ताई नहीं रहीं. हिंदी फिल्म जगत और उनके चाहने वाले उन्हें प्यार से ‘ताई’ ही कहते थे. उनका हरेक गाना एक मिसाल और धुआंधार था.
आशा ताई को बखूबी पता रहता था कहां तान लेनी है, किस अंतरे पर आवाज के साथ खेलना है, कौन सी जगह पर भावनाओं का तड़का लगाना है और कहां मुरकी लेकर हैरान करना है, इसमें माहिर थीं पद्म विभूषण आशा भोसले. जैसे आग में तपकर सोना कुंदन बन जाता है, वैसा ही इस जिद्दी सिंगर के लिए कहा जा सकता है. लता की बहन को सब कुछ थाली में सजा कर नहीं मिला. बड़ा जतन किया रियाज करते हुए गायकी में धमक के साथ अपना मुकाम बनाने के लिए.




