FOURTHPILLARSNEWS29 नवम्बर 2025
रायपुर। शासकीय जे. योगानंदम छत्तीसगढ़ महाविद्यालय में आयोजित त्रि-दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सेमिनार “भारत में लोकतंत्र के 75 वर्ष एवं भारतीय ज्ञान प्रणाली : बहु-विषयी दृष्टिकोण” का आज दिनांक 29 नवम्बर 2025 को समापन हुआ। आयोजन सचिव डॉ. विनीता अग्रवाल ने बताया कि इस अंतरराष्ट्रीय सेमिनार में देश-विदेश से आए विद्वानों, शोधार्थियों, शिक्षकों और विद्यार्थियों की उत्साहपूर्ण सहभागिता रही एवं महाविद्यालय प्राचार्य प्रो. तपेश चंद्र गुप्ता के मार्गदर्शन में पूरा सेमिनार सुव्यवस्थित रूप से सम्पन्न हुआ।
नागरिकों को सतर्क रहने और कर्तव्यों का पालन करने की आवश्यकता हैः न्यायमूर्ति गौतम चौरडिया त्रि-दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का समापन

महाविद्यालय प्राचार्य प्रो. तपेश चंद्र गुप्ता ने बताया कि समापन सत्र में मुख्य अतिथि छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के माननीय न्यायमूर्ति श्रीमती रजनी दुबे, विशिष्ट अतिथि, श्री गौतम चौरडिया, अध्यक्ष, छत्तीसगढ़ राज्य उपभोक्ता आयोग ने अपने उद्बोधन से सभागार को भाव-विभोर कर दिया।
माननीय न्यायमूर्ति श्रीमती रजनी दुबे ने अत्यंत सरल एवं हृदयस्पर्शी शैली में श्रोताओं को संबोधित किया। उन्होंने कहा “आज भी लोगों का न्यायपालिका पर पूरा भरोसा है, लोग कहते हैं ‘कोर्ट में देखेंगे’, यह आस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी हम सबकी है।” आजकल खबरों में आता है कि बच्चे प्रतियोगिता में असफल होने पर डिप्रेशन में चले जाते हैं और आत्महत्या कर लेते हैं। उन्होंने युवाओं से निरंतर प्रयास करने और कभी हताश न होने की अपील की। अपनी निजी जीवन-यात्रा साझा करते हुए बोलीं कि “मैंने युवावस्था में क्लर्क का फॉर्म भरा था, वह रिजेक्ट हो गया। लेकिन मैंने हार नहीं मानी, कानून की पढ़ाई की, सिविल जज बनी और आज आपके सामने न्यायमूर्ति के रूप में खड़ी हूँ।
माननीय न्यायमूर्ति श्रीमती रजनी दुबे ने कहा कि, जो हो रहा है, वह भगवान की इच्छा से ही हो रहा है।” उन्होंने कहा कि “नर्वस ब्रेकडाउन आज का नया शब्द है, पहले ऐसा नहीं होता था।

जीवन समुद्र है, इसमें मोटी चमड़ी बनानी पड़ती है। सोशल मीडिया पर धर्म को लेकर तरह-तरह की बातें होती हैं, लेकिन अगर आप किसी को नहीं मानते तो कम से कम अपने माता-पिता को मानिए, उन पर आस्था रखिए और निरंतर कर्म करते रहिए, सफलता अवश्य मिलेगी।
माननीय न्यायमूर्ति गौतम चौरडिया ने “75 वर्षों का भारतीय लोकतंत्र” विषय पर बोलते हुए कहा कि लोकतंत्र को जीवंत बनाए रखने के लिए कुछ सुरक्षा बिंदु अत्यंत आवश्यक हैं। उन्होंने बल दिया कि भारतीय लोकतंत्र की रक्षा के लिए हर नागरिक को सतर्क रहना होगा, कानून का शासन स्थापित करने के लिए न्यायपालिका, कार्यपालिका एवं विधायिका में संतुलन जरूरी है, प्रत्येक नागरिक में मूल कर्तव्यों की भावना जागृत करनी होगी, आत्म-अनुशासन, चरित्र निर्माण तथा आदर्श मानकों को बनाए रखना ही लोकतंत्र की असली नींव है।

महाविद्यालय प्राचार्य प्रो. तपेश चंद्र गुप्ता ने अपने उद्बोधन में भारत के लोकतांत्रिक मूल्यों और 75 वर्षों की उपलब्धियों पर प्रकाश डाला।
उन्होंने बताया कि सेमिनार में भारतीय ज्ञान प्रणाली और उसके आधुनिक समाज में योगदान पर महत्वपूर्ण चर्चा हुई एवं कार्यक्रम ने छात्रों और शोधकर्ताओं को प्रेरित करते हुए ज्ञान और विचारों के आदान-प्रदान का उत्कृष्ट अवसर प्रदान किया। उन्होंने सेमिनार की सफलता के लिए उच्च शिक्षा सचिव, उच्च शिक्षा आयुक्त, छत्तीसगढ़ शासन, कलिंगा विश्वविद्यालय, भारतीय स्टेट बैंक, आयोजन समिति, सभी कर्मचारियों, रिसोर्स पर्सन्स, मीडिया, प्रतिभागियों और स्टाफ सदस्यों का हृदय से धन्यवाद किया।
इससे पूर्व तकनीकी सत्रों में जाम्बिया विश्वविद्यालय की प्रख्यात मानवशास्त्री डॉ. एम्मा सिताम्बुली ने “विदेश में विरासत का पुनरुत्पादनः जाम्बिया में भारतीय ज्ञान और मूल्य प्रणालियों पर एक मानवशास्त्रीय अध्ययन” शीर्षक से अपना शोधपूर्ण व्याख्यान दिया। उन्होंने बताया कि उपनिषदों का एकत्व का भाव, कर्म-धर्म का सिद्धांत, शाकाहार, योग और गांधीवादी अहिंसा आज भी जाम्बिया में भारतीय मूल के परिवारों एवं स्थानीय समुदायों में जीवंत है।
औपनिवेशिक काल में वहाँ पहुँचे भारतीयों के वंशज आज भी दीपावली-रामनवमी मनाते हैं, संस्कार कराते हैं
भगवद्गीता के श्लोक बच्चों को सिखाते हैं। डॉ. एम्मा ने अपनी फील्ड स्टडी के आधार पर दर्शाया कि भारतीय “वसुधैव कुटुम्बकम” का विचार अफ्रीकी आध्यात्मिक परंपराओं के साथ मिलकर एक अनूठा संश्लेषण रच रहा है। उन्होंने इसे भारत की सॉफ्ट पावर का सबसे जीवंत रूप बताया।
थाईलैंड के विद्वान डॉ. अरुण चैनित ने ‘‘भारतीय लोकतंत्र के 75 वर्षों का गौरवगान‘‘ शीर्षक से भारतीय लोकतंत्र की भूरि-भूरि प्रशंसा की।
हिंदी और अंग्रेजी दोनों में धाराप्रवाह बोलते हुए उन्होंने कहा कि वेदकालीन गणपरिषद् और बौद्ध संघों की परंपरा ही आज दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में जी रही है। प्राचीन पंचायत व्यवस्था से लेकर आज की संवैधानिक बहुलतावाद तक भारत ने विविधता में एकता का जो मॉडल दिया है, वह अनुपम है। डॉ. चैनित ने इसे “शासन में वसुधैव कुटुम्बकम् का सबसे व्यावहारिक रूप” बताया और कहा कि दक्षिण-पूर्व एशियाई देश भारत के इस प्रयोग से बहुत कुछ सीख सकते हैं।
प्रख्यात शोधकर्ता डॉ. अशीफा, तुर्की विश्वविद्यालय ने ‘‘भारतीय ज्ञान प्रणाली : शोध संस्कृति और लोकतांत्रिक प्रगति‘‘ विषय पर अपना प्रभावशाली उद्बोधन दिया।
उन्होंने बताया कि भारत की प्राचीन शोध-परम्परा, जिसमें नालंदा-तक्षशिला की गुरुकुल पद्धति, तर्क-वितर्क की परम्परा और “प्रमाण-मीमांसा” शामिल हैं , आज भी विदेशी विश्वविद्यालयों में शोध की गुणवत्ता और लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत करने के लिए प्रेरणा दे रही है। डॉ. अशीफा ने अपने शोध के आधार पर दर्शाया कि तुर्की में भारतीय मूल के शिक्षाविद् एवं छात्र आज भी वेदांत, न्याय-दर्शन और गांधीवादी अहिंसा को शोध एवं सामाजिक कार्यों में लागू कर रहे हैं। उन्होंने कहा, “भारतीय ज्ञान प्रणाली ने हमें सिखाया है कि सच्चा शोध वही है जो समाज को मुक्त करे और लोकतंत्र को सशक्त बनाए।”
हिदायतुल्लाह नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, रायपुर के प्रो. दीपक श्रीवास्तव ने ‘‘भारतः लोकतंत्र की जननी‘‘ शीर्षक से अत्यंत ओजस्वी व्याख्यान दिया। उन्होंने ऐतिहासिक प्रमाणों के साथ सिद्ध किया कि विश्व की सबसे प्राचीन गणराज्य परम्परा भारत में ही थी, वैदिक काल की सभाएँ, गणपरिषदें, बौद्ध संघ आज के संसदीय लोकतंत्र के मूल में हैं। प्रो. श्रीवास्तव ने कहा, “जब पूरा विश्व राजतंत्रों में जी रहा था, तब भारत में जनपदों और गणराज्यों में जनता अपना शासक चुनती थी। आज 75 वर्षों में भारत ने जो लोकतांत्रिक चमत्कार दिखाया है, वह उसी प्राचीन परम्परा का आधुनिक स्वरूप है।” उन्होंने संविधान की प्रस्तावना को उपनिषदों के “सर्वे भवन्तु सुखिनः” से जोड़कर सभी को भाव-विभोर कर दिया।
संगोष्ठी के दौरान कला, वाणिज्य, विज्ञान और विधि संकायों के समानांतर तकनीकी सत्रों में 100 से अधिक शोध-पत्र प्रस्तुत किए गए, जिनमें भारतीय न्यायशास्त्र, प्राचीन आर्थिक ढाँचा, सौंदर्यशास्त्र, गणित, रसायन, खगोल, पर्यावरण, आयुर्वेद तथा सार्वजनिक नीति जैसे विषयों पर शोधार्थियों ने अपने निष्कर्षों को विस्तारपूर्वक रखा।
समापन सत्र के अंत में सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किया गया। धन्यवाद ज्ञापन डॉ. पारमिता दुबे विभागाध्यक्ष, प्राणीशास्त्र विभाग, शासकीय जे. योगानंदम छत्तीसगढ़ कॉलेज, रायपुर एवं डॉ. सुषमा दुबे, सहायक प्राध्यापक, कलिंगा विश्वविद्यालय, रायपुर ने किया। मंच संचालन डॉ. वासुदेव साहसी द्वारा प्रभावी रूप से संपन्न हुआ। आयोजन सचिव डॉ. विनीता अग्रवाल ने अंत में सभी अतिथियों, प्रतिभागियों और सहयोगियों के प्रति आभार व्यक्त किया।




