भारतीय प्रज्ञा चिंतन में उपनिषदों का स्थान सर्वोच्च है. तैतिरिय उपनिषद शिक्षा वल्ली का प्रसिद्ध मंत्र है, ”रसो वै सः. रसं ह्येवायं लब्ध्वानन्दी भवति.” अर्थात, वह (परतत्व) रस का स्वरूप है. जो इस रस को पा लेता है वही आनन्दमय बन जाता है.
भारतीय दार्शनिक चिंतन के अनुसार उसी आनंदमय परम तत्व का अवतार जीव-जगत पर कृपा करने हेतु समय समय पर होता रहता है. अवतार तो असंख्य है, किन्तु ‘रस” का पूर्ण स्वरूप भारतीय मनिषियों ने श्रीकृष्ण को कहा है. प्रसिद्ध अद्वैत वेदान्ती मधुसूदन सरस्वती अपने जीवन भर की अद्वैत साधना का प्रयोजन एक वाक्य में कहते है,
”कृष्णात् परम किमपि तत्त्वमहं न जाने॥”

कृष्ण से भी बड़ा कोई तत्व है तो उसे हम नहीं जानते! इसका कारण क्या है? वास्तव में श्रीकृष्ण दिव्य जगत और लोक जगत के मध्य के सेतु है. अवतार होकर भी मानवीय गुणों से परिपूर्ण है. उनकी लीलाएं दिव्य है, अनुकरणीय नहीं, किन्तु उनके उपदेश सार्वभौम है. जगत के प्रत्येक जीव के हित में है. मानवीय संबंधों के जीतने आयाम है उन सबका पूर्ण विकास हमें श्री कृष्ण चरित्र में दिखता है.
श्रीकृष्ण की लीलाएं
इसी कारण से प्रायः सभी भारतीय आचार्यों ने कृष्ण लीलाओं के ध्यान, मनन और निधिध्यासन को साधना का सर्वोत्कृष्ट मार्ग कहा है. भक्ति मार्ग के सभी आचार्यों, रामानुज, मध्व, निम्बार्क् और विष्णुस्वामी ने वृंदावन विहारी श्रीकृष्ण को ही अपना इष्ट कहा है. यहां तक की निर्गुण निराकार ब्रह्मवादी आचार्य शंकर भी कृष्ण लीलाओं का ध्यान करते हुए कहते हैं,
”गोविंदम भज मूढ़ मते.” वेदांतियों का निराकार ब्रह्म ही नन्द और यशोदा के लालड़े कान्हा हैं. यद्यपि राम् और कृष्ण में अभेद है. किन्तु रामावतार में उनकी मर्यादापूर्ण लीलाएं जगत प्रसिद्ध हैं, आदर्श व्यक्ति का उदाहरण राम् के चरित में पग-पग पर दिखता है.
कृष्णावतार में लीलाएं मधुर रससिक्त है. भक्त उनका गान करते हैं, उसका स्मरण करते हैं किन्तु अनुकरण नहीं करते. राम ने अपने चरित्र के माध्यम से शिक्षा दी, किन्तु कृष्ण ने युद्ध के समय अपने मित्र को ज्ञान देने के बहाने सम्पूर्ण मानव जाति को शिक्षा दी. कृष्ण चरित्र की यही विशेषता है. वहां लीला रस और ज्ञान रस का अद्भुत समन्वय दिखता है. वह लोकोत्तर शक्ति सम्पन्न देवता भी है और मानव के बहुत समीप रहने वाले गीता गायक शिक्षक-मार्गदर्शक भी.
कृष्ण चरित्र की गाथा श्रीमदभागवत महापुराण में है. उनकी शिक्षाएं श्रीमद्भगवद् गीता में. दोनों ही ग्रंथ भारतीय परंपरा में अपना विशेष स्थान रखते हैं. भागवत के संबंध में तो विद्वानों की उक्ति प्रसिद्ध ही है, ”विद्यावतां भागवते परीक्षा”, विद्वानों की परीक्षा भागवत में होती है. अनादि काल से भागवत भक्तों का संपद रहा है. भक्ति काल में भागवत की महिमा वेदों से अधिक मानी गई. भागवत साधना का फल है. भगवद गीता साधना के मार्ग को बताने वाली.
मानवीय जीवन की जटिलताओं से मुक्ति का उपाय भगवद् गीता देती है. भगवद् गीता सार्वभौम शिक्षाओं का ग्रंथ है. जो उपदेश सभी देश, काल और अवस्था में मनुष्य मात्र के अभ्युदय (सांसारिक प्रगति) और निश्रेयस (अध्यात्मिक लक्ष्य प्राप्ति) कराने वाला हो, उन्हें ही सार्वभौम कहा जा सकता है. कृष्ण चरित्र में भगवद् गीता के उपदेश जो उन्होनें अपने प्रिय सखा अर्जुन को दिए, उनमें कई ऐसे तत्व हैं जिनसे मानव मात्र का कल्याण हो सकता है.
भगवद् गीत पर प्रायः सभी आचार्यों और विद्वानों ने अपनी टिकाएं और व्याख्याएं प्रस्तुत की हैं, साधना के पथ पर जाने वाले कितने ही मानव इन आचार्यों का अनुसरण कर अपना कल्याण कर चुके हैं और आगे भी करते रहेंगे. साधना के अतिरिक्त भी साधारण मानवों के हितार्थ भगवद गीता के माध्यम से भगवान ने कई ऐसे उपदेश दिए हैं, वह मानव मात्र को कल्याण का मार्ग दिखाती है.
भगवद गीता अध्याय 2 का श्लोक संख्या 63 कहता है
क्रोधाद्भवति सम्मोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः . स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ॥
क्रोध से मोह का जन्म होता है; मोह होने पर स्मृति भ्रष्ट हो जाती है; स्मृति के भ्रष्ट होने से बुद्धि नष्ट हो जाती है और बुद्धि के नष्ट होने से मनुष्य नष्ट हो जाता है.




