‘छोटी द्रोण पुष्पी’ ये वास्तव में अत्यंत दुर्लभ जड़ी-बूटियों में से एक है। ये गांवों और शहरों में खरपतवार के रूप में देखी जा सकती है। बरसात के बाद ये गांवों के खेतों की मेड़ों पर प्रायः नज़र आती है। इसलिए गांवों में इसे ‘मेढ़ापाती’ के नाम से भी जाना जाता है। ये पुष्प विशेष पूजन-अनुष्ठान और मंत्र सिद्धि के लिए ‘शिवपिण्ड’ पर अर्पित किया जाता है। इस अति विशेष पुष्प का नाम
‘छोटी द्रोण पुष्पी’ ( Leucas Aspera or Leucas Cephalotes) है।

छोटी और बड़ी दोनों प्रकार की ‘द्रोण पुष्पी’ की पहचान ये है कि,इसमें फूल में से नई पत्ती और तना विकसित होता है। छोटी द्रोणपुष्पी में ही विशेष औषधि गुण होते हैं। द्रोण का अर्थ होता है ‘रक्षक या रक्षा करने वाला’।
तय है ये बहुत कम लोगों को ज्ञात है कि ये प्रकृति के ‘श्रेष्ठ एन्टीबायोटिक्स’ में से एक है। इसके पंचांग के चूर्ण या चाय या काढ़े के रूप में प्रयोग होता है। इससे शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। अडूसा और सीतफल वृक्षों के पत्तों की तरह इस पर भी कीड़े नहीं लगते हैं। आकाशवाणी में कार्य करते हुए हमने किसान वाणी में इस बात का खूब संदेश प्रसारण किया था कि,किसान भाई यदि तमाम फसलों के बीच बीच में एक लाइन इस पौधे की लगाएं। तो फसलें प्राकृतिक रूप से कीड़ों से बच सकती हैं। शेष जड़ी-बूटी चर्चा बाद में।
डा.ऋषु,छिंदवाड़ा (म.प्र.) आयुर्वेदाचार्य,जड़ी-बूटी विशेषज्ञ,होमियोपैथ, प्राकृतिक चिकित्सक, ज्योतिषाचार्य,आशुज्योतिषज्ञ, विचारक-चिंतक और साहित्यकार 8421485353




