यूरोप में 40 डिग्री पर पिघल रही सड़कें, भारत में 45 पारा झेल रहे लोग

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यूरोप इन दिनों भीषण गर्मी झेल रहा है। आलम ये है सड़कें पिघल रही हैं, जबकि लोग गर्मी से राहत के लिए घरों से बाहर निकल रहे हैं। वहीं भारत में लोग आसानी से 45 डिग्री सेल्सियस तक का पारा झेल जाते हैं। जानते हैं यूरोप और भारत में ये अंतर क्या है
गर्मी से पूरी दुनिया परेशान है। यूरोप में लोग गर्मी से बेहाल हैं। वहीं, मई में दो दिन ऐसे रहे, जब दुनिया के सबसे गर्म 50 शहर भारत के ही थे। पिछले महीने देश में करीब 40% ही बारिश हुई। मौसम के इस बदलाव पर पूनम गौड़ ने स्काईमेट के उपाध्यक्ष (मेट्रोलॉजी एंड क्लाइमेट चेंज) महेश पलावत से बात की। मुख्य अंश इस बार गर्मी से यूरोप तक बेहाल है। वहां लोगों की जानें जा रही हैं। इस बदलाव के क्या मायने हैं? क्या आने वाले बरसों में स्थिति और बुरी होगी….?


फिलहाल यूरोप हीट डोम बना है। इसमें एंटी-साइक्लोनिक सर्कुलेशन बनता है। हवाएं नीचे की और बहती हैं। इस कारण जमीन के आसपास की गर्मी धरती की सतह के पास ही फंसकर रह जाती है। इसी वजह से तपिश लगातार बढ़ती रहती है। फ्रांस, ब्रिटेन, स्पेन, जर्मनी, ऑस्ट्रिया, नीदरलैंड और स्विट्जरलैंड में गर्मी ने रेकॉर्ड तोड़ दिया है। हालांकि, इसका असर कुछ समय में कम होगा, लेकिन ऐसी स्थितियां अब जल्दी-जल्दी आ रही हैं।

यूरोप में सड़कें पिघल रही हैं, जबकि भारत में तो लोग 45 डिग्री सेल्सियस तापमान भी झेल लेते हैं। आखिर इतना अंतर क्यों है…?

यूरोप और भारत की जलवायु और भौगोलिक स्थिति में काफी अंतर है। दोनों क्षेत्रों में भवन, सड़क निर्माण आदि स्थानीय जलवायु को ध्यान में रखकर अलग तरह की सामग्री से बनाए जाते हैं। यूरोप में इमारतें और सड़कें बर्फीली सर्दियों के लिहाज से बनती हैं। इमारतों की मोटी दीवारें गर्मी को अधिक देर तक रोककर रखती हैं। भारत में सड़कें गर्मी और बारिश के मद्देनजर बनाई जाती हैं। यहां के भवन ऐसी गर्मी के लिए तैयार होते हैं। भारत में तापमान पिछले कई बरसों से 45 डिग्री तक पहुंचता रहा है। इसलिए लोग ऐसी गर्मी के अभ्यस्त हो चुके हैं।

प्री-मॉनसून सीजन में पूर्वानुमान चुनौती बने रहे। कई बार गलत साबित हुए। पिछले साल भी धराली आपदा के दौरान पूर्वानुमान कमतर रहे। ऐसे में अर्ली वॉर्निंग सिस्टम में किन बदलावों की जरूरत है और यह कैसे संभव होगा?
बादल फटने का अनुमान मौसम विभाग नहीं लगा पाता। दरअसल, भारत में ऐसी घटनाएं पर्वतीय इलाकों में होती हैं। इसके लिए डॉप्लर रडार की संख्या बढ़ानी होगी। जब तक यह कमी पूरी नहीं होगी, आकलन संभव नहीं है। बीते कुछ बरसों में इनकी संख्या बढ़ी है, लेकिन जरूरत के अनुसार अब भी कम है। आपदा से अधिक नुकसान न हो, इसके लिए नाउकास्टिंग (तीन घंटे के पूर्वानुमान) को ज्यादा सटीक और कम समय में अधिक लोगों तक पहुंचाने की जरूरत है।

गर्मी का मूल कारण अल-नीनो ही है या कुछ और वजह है?
भारत में कम मॉनसून की वजह से अभी कुछ महीनों तक उमस अधिक रह सकती है। इस बार अल-नीनो की वजह से हालात बदतर हुए हैं। लेकिन, इन सब के पीछे जलवायु परिवर्तन अहम वजह है। कड़े उपाय नहीं किए तो स्थिति बिगड़ती जाएगी। अल-नीनो और ला-नीनो की आवृत्ति तेज हुई है। ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी नहीं आ रही। ऐसे में तापमान बढ़ना तय है

ओजोन गैस का प्रदूषण बढ़ रहा है। यह कैसे कम होगा?
खतरनाक रेडिएशन तेजी से बढ़ रहे हैं। सिर्फ ओजोन ही नहीं, अल्ट्रा वॉयलेट (UV) प्रदूषण भी बढ़ रहा है। कई देशों में ओजोन को कम करने की दिशा में काम किए जा रहे हैं। जमीनी स्तर के ओजोन कम करने के लिए वाहनों से होने वाले उत्सर्जन को कम करना जरूरी है। यह ईंधन से निकलने वाले नाइट्रोजन ऑक्साइड से बनता है। भारत में अभी इसके लिए कोई तैयारी नहीं है। यहां अधिकतर काम धूल कम करने के लिए हो रहे हैं। हमें भविष्य और मौजूदा समस्याओं को ध्यान में रखकर तैयारियां करनी होंगी।

WMO चेता चुका है कि 2030 तक किसी भी एक साल तापमान सामान्य से 1.9 डिग्री अधिक रह सकता है। आने वाले 5 साल में कई रेकार्ड टूटेंगे। इसके क्या मायने हैं?
इसका सीधा मतलब है कि दुनिया 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा के भीतर तापमान वृद्धि को रोकने में विफल हो रही है। इसके लिए हमारे प्रयास नाकाफी रहे। अगले चार-पांच साल गर्मी और जलवायु परिवर्तन के लिए काफी अहम होंगे। यह वह साल है, जब विभिन्न देशों को एकजुट होकर जलवायु परिवर्तन को कम करने के उपाय तेज करने होंगे। वैश्विक स्तर पर जलवायु परिवर्तन को लेकर देशों में मतभेद हैं। कंक्रीट के जंगल से देश व दुनिया के कई कोनों में अर्बन हीट आइलैंड बन रहे हैं। ग्लेशियर पिघलने से समुद्र का जलस्तर तेजी से बढ़ रहा है।

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